Sunday, 4 July 2010

नज़्म زم

नज़्म      زم

इक आग की बारिश
बेकराँ रात की ख़ामोशी
ज़माने  से बेकौफ
इक साथ ज़हर पीने की ख्वाहिश 
न चाँद नज़र आया
न शब् का गुज़ारना याद रहा
उफक पे हंगामा सा बरपा
मुक्तसर रात और तवील ज़िन्दगी
यूँ गुज़री हम अपना अक्श भूल गए
मस्जिद ओ मंदिरों में इश्तेहार 
गुमशुदगी का लगा गया कोई
हर शु थे आशना चेहरे
हम अपना ठिकाना भूल गए
 ايس سانيال --शांतनु सान्याल


































 



ग़ज़ल

ज़रा सी बात थी इशारों से कहा होता
हजूम सा था हद-ए-नज़र  तमाशाई
हम डूब के गुज़रते जानिब-ए-साहिल
राज़-ए-उल्फत किनारों से कहा होता
तमाम रात चांदनी सुलगती रही
इज़हार-ए-वफ़ा आब्सारों से कहा होता
गुमसुम सा आसमाँ तनहा तनहा
तड़प दिल की चाँद तारों से कहा होता
हवाओं में तैरती तहरीर-ए-इश्क
आँखों की बातें बहारों से कहा होता
हम जान लुटाये बैठे हैं
इम्तहान-ए-अज़ल अंगारों से कहा होता /
 --शांतनु सान्याल

कुछ गुमनाम पन्ने---

इक लम्बी, खट्टी मीठी सी ज़िन्दगी
और लुकछुप करता बचपन-
पहाड़ी झरने की मानिंद बिखरते लम्हात
रेत पे लिख लिख कर किसी का नाम,
मुस्कराके मिटा देना --
अपनी ही परछाइयों से सहमते हुए
ज़माने के तमाम पहरे को
मुंह चिड़ाना, ओ खुबसूरत यादें --
शाम ढलते टूटे मंदिर के जानिब
दीप जलाने के बहाने
निगाहों से दिल  की बात कहना
न कोई हसरत, न ही तकाज़ा
मासूम जज्बात, इश्क की बुनियाद
ओ ख्वाब जो कभी हकीक़त में ढल न सके -
ज़िन्दगी इक किताब जिसे पढ़ न सका कोई
पन्ने अपने आप जुढ़ते गए, दिन ब दिन-
मौसम की तरह रिश्तों के रंग, बदलते रहे
चाहत के तलबगार एक लम्बी फेहरिश्त -
हर कोई चाहे ढल जाऊं उसके सांचे में,
काश ओ गुमनाम पन्ने, किसीने पढ़ा होता
इक ग़ज़ल जो लबों पे आकार बिखर गयी वादियों में
आज भी फूल ओ खुशबुओं में उसके अक्श हैं मौजूद
वक़्त मिले कभी तो तलाश कीजिये
कुछ गुमनाम पन्ने--हवाओं में तैरती तहरीरें,
बादलों में पैगाम-ए मुहोब्बत, ओ इज़हार-ए-वफ़ा
जो कांच की तरह नाज़ुक, लेकिन बेदाग़ मुक़द्दस था /
----शांतनु सान्याल

Saturday, 3 July 2010

चलो खो जाएँ ---

दिल चाहे आज, खो जाएँ कहीं दूर नीली वादियों में-

तिलिस्मी चाँद, निशाचर पखेरू,अनजान खुशबु-

अरण्य फूलों की,यायावर ख्यालात और तुम हो साथ,

न करो तुम मुझसे कोई सवालात, न मैं ही जवाब दूँ /

किरणों के रास्ते, अरमानों के हमराह, कोई और जहाँ,   चलो खो जाएँ

चलो तलाश करें, उफक से कहा है रोक ले सुबह को,

उम्र भर ये रात रहे बरक़रार, अपनी मुहोब्बत की तरह /
---शांतनु सान्याल
खामोश निगाहों की जुबान
और दिल की गहराइयाँ,
मुस्कानों का दर्द और
हसने की वो मजबूरियां,
किसे छोड़े किसे अपनाएं
नज़दीक हैं सभी परछाईयाँ
अंतहीन रिश्तों की चाहत
और निगलती तन्हाईयाँ,
ओ मुखातिब हैं निगाहों के
और रेत भरी वक़्त की आंधियां /
--- शांतनु सान्याल 

एक लम्बी रात रहस्मयी

धूमिल आकाश, सूर्य अस्तगामी
अलस मरुभूमि,सांझ बोझिल
प्रवासी विह्ग, अन्तरिक्ष विशाल
कुछ अवाक चेहरे, अनजान शहर
अज्ञात  भविष्य, बूँद बूँद स्मृति
देश,माटी,नदी,पहाड़,समुद्र,वर्षा
शरत, चन्द्रमा,और अश्रु घनीभूत
मौसमी पुष्प, सुवासित वातायन
बच्चों की किलकारियां, अतुलनीय
माँ की झिड़क, और आलिंगन
जन अरणय, रेल का गुज़ारना 
उदास आँखों से छुटता अपनापन
विमान का अकस्मात् उड़ना
और एक लम्बी रात रहस्मयी /
---शांतनु सान्याल

वक़्त के पहले

वक़्त के पहले
इक उम्र से तलाश थी जिसकी
निग़ाह दर निग़ाह भटकते रहे
ओ जो मेरे अश्क से था तर ब तर
दिल के किसी कोने में छुपा हुवा
गुम सुम सा डरा डरा
इक ख्याल --कमसिन अहसास
दरवाज़े के इक कोने में
किसी नादान बच्चे की तरह
अक्सर छुप कर लिबास बदलता हुवा
दुनिया की निगाहों से बचता रहा
आज बात कुछ और है
ओ नन्हा सा मासूम कहीं खो सा गया
अब ओ खुद को देखता है
बेलिबास आईने के सामने
और अपनी शख्शियत को सजाता है
दरवाज़े के बाहर बेचने के लिए
ज़माने उसे वक़्त के पहले ही
जवान बना डाला /
--शांतनु सान्याल